आलेख: © डॉ. राकेश वशिष्ठ वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादकीय लेखक
भारत एक लोकतांत्रिक देश है। चूंकि देश की आजादी के बाद सबसे बड़ी क्रांति यह थी कि लोक सभा तथा राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचन के लिए सार्वजनिक वयस्क मताधिकार को अपनाया गया। घोर पिछड़ेपन, घोर दरिद्रता तथा घोर निरक्षरता वाले, नए-नए स्वाधीन हुए देश में हर नागरिक को जिसकी आयु 21 वर्ष से कम न हो (अब घटाकर 18 कर दी गई है) और जो किसी विधि के अधीन अनिवास, चित्तविकृति, अपराध या भ्रष्ट अवैध आचरण के आधार पर अन्यथा अयोग्य न हो, वोट का अधिकार देना संविधान निर्माताओं के लिए एक बहुत बड़ी आस्था और जनसाधारण में विश्वास का काम था (अनुच्छेद 326)। अनुच्छेद 324 कहता है कि एक निर्वाचन आयोग होगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश में जनता का महत्व होता है। जनता ही अपने नेता का चुनाव करती है और जनता अपने नेता का चुनाव मतदान के जरिए करती है। इसलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था मैं मतदान बेहद महत्वपूर्ण होता है। हर जागरुक नागरिक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह मतदान की प्रक्रिया में दिलचस्पी रखे और स्वेच्छा से अपने मताधिकार का प्रयोग करें, जिससे उसके प्रतिनिधि के रूप में सही नेता का चुनाव किया जा सके। लोकतांत्रिक व्यवस्था के संरक्षण के लिए और पारदर्शी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शत प्रतिशत मतदान होना बेहद जरूरी है। इसी के जरिए लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होती हैं। भारतीय नागरिकों को मतदान का अधिकार प्राप्त है। स्वतंत्र मतदान हर भारतीय नागरिकों का एक वैधानिक अधिकार है। लेकिन भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में मतदान का प्रतिशत दिन-ब-दिन घटता जा रहा है। लोगों के मन में मतदान को लेकर उदासीनता भी देखने को मिल रही है। जिससे प्रबुद्धजनों और राजनेता भी चिंतित हैं। मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है क्योंकि यदि उदासीनता बढती गई तो लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण होता जाएगा और भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था को बनाए रखना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे तो फिर लोकतांत्रिक जीवन की समाप्ति हो जाएगी। सवाल कभी-कभी यह भी आता है कि क्या मतदान को अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए और जो लोग मतदान न करें उन्हें दंडित किया जाये? लेकिन फिलहाल भारत में मतदान को कानूनी स्तर पर अनिवार्य नही बनाया गया है, लेकिन विश्व के अनेक देशों में मतदान को अनिवार्य कर दिया गया है। भारत में मतदान को लेकर उदासीनता देखी जा रही है, जिसकी वजह कही न कही यह है कि हमारे नेता अपनी जनता की कसौटी पर खरे नही उतर रहे हैं। जनता जो भी अपेक्षाएं अपने नेता से होती है वो उन पर खरे नही उतर पा रहे है। जिससे जन मानस के मन में सरकार के प्रति उदासीनता जन्म ले रही है। आजादी के बाद जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था और विकास की अपेक्षा की गई थी आज तक वहाँ पहुंचा नही जा सका है। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गरीबी, भुखमरी, जातिवाद, क्षेत्रवाद, अपराध, आतंक जैसे जन समस्या इतनी ज्यादा बढ़ गई है कि जनसाधारण इसमें फंस गया है और लोकतांत्रिक व्यवस्था से उसका विश्वास डगमगाने लगा है। जनमानस को लगता है उनके अमूल्य मतदान का लोकतंत्र का कोई मतलब ही नही है। यही वजह है कि जनता मतदान के प्रति उदासीन हो रही है। इससे व्यक्ति की लोक तांत्रिक स्वतंत्रता पर चिन्ह लग गया है। घटते मतदान से सवाल ये उठता है कि क्या मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए मतदान को कानूनी रूप से बाध्य कर दिया जाना चाहिए? लेकिन सवाल यह भी है कि अगर ऐसा कर दिया जाता है तो भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में यह सारा शर्मनाक माना जाएगा। वर्तमान राजनीतिक प्रदूषण के चलते मतदाता खुद को ठगा सा महसूस करता है। कानूनी बाध्यता के बाद स्थित में सकारात्मक बदलाव आएगा या नही यह भी महत्वपूर्ण है। जनता द्वारा जो भी प्रतिनिधि चुने जा रहे हैं वह अपने मतदाता का विश्वास नही जीत पा रहे हैं न ही सदन में जनता के प्रति मर्यादा और जिम्मेदारी भरा आचरण कर रहे हैं। जन-प्रतिनिधियों द्वारा किए जाने वाले गैर जिम्मेदाराना रवैये से ही मतदाताओं में व्यापक रूप से उदासीनता देखने को मिल रही है। कम मतदान होने के पीछे एक प्रमुख कारण अशिक्षा और जागरूकता की कमी भी है। एक वोट या एक मतदान देश व प्रदेश के लिए क्या उपयोगी साबित होगी? लेकिन क्या देश व प्रदेश हित के लिए मतदान करना वास्तव में एक जरूरी है? ऐसे सामान्य प्रश्न में ही गम्भीर उत्तर छुपा हुआ है। जिस तरह से फसलों के लिए पानी, पानी के लिए पेड़-पौधे-हरियाली, खेती लिए इंसान की जरूरत है और इंसान के लिए अनाज-पानी, आवास, शिक्षा, अस्पताल, सड़क, बिजली, रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों की आवश्यकता होती है। ऐसे में स्वस्थ व मजबूत लोकतंत्र के लिए प्रत्येक वोट महत्वपूर्ण है। निर्वाचन आयोग, राजनीतिक दलों व आम मतदाताओं की भूमिका, सक्रियता,संवेदनशीलता से भरे होते हैं। अलग-अलग वर्ग के मतदाताओं को कई बार भ्रम की स्थितियों का सामना करना पड़ता है। इस पर निर्वाचन आयोग लगातार सुधार व नियम-प्रक्रियाओं में संशोधन समय-समय पर करते हैं ताकि मतदाता आसानी से अपने मत या वोट के महत्व को बेहतर तरीके से समझ सके। लोकतंत्र की सफलता तभी होगी जब लोग मतदान करेंगे। देश की प्रगति के लिए सबको मिलकर वोट देना चाहिए। मतदान सभी का संवैधानिक अधिकार है। इसका उपयोग सभी लोगों को स्वेच्छा के साथ करना चाहिए। हम खुशनसीबों में से हैं कि हमें सरकार चुनने का अधिकार मिला है। हमें इसकी सराहना और कदर करनी चाहिए। यह भारतीय लोकतंत्र की खूबसूरती ही है कि कोई हवाई जहाज का मालिक हो या ठेला चलाने वाला आम नागरिक, सबको वोट देने का अधिकार है। सभी का मत बराबर है। मतदान के प्रति उदासीनता को दूर करने के लिए लोगों में जागरूकता को बढ़ाना बेहद जरूरी है। लोगों को यह समझाना जरूरी है कि मतदान का महत्व क्या है और मतदान करना क्यों जरूरी है? लोकतंत्र को मजबूत बनाने में शत-प्रतिशत मतदान होना बेहद जरूरी है। राजनीतिक स्थिरता, विकास और प्रगति के लिए मतदान करना हर नागरिक का कर्तव्य होना चाहिए। हमे मतदान करने के लिए लोगों को जागरूक करने के लिए इसके प्रचार-प्रसार की दिशा में काम करना होगा, साथ ही व्यवहारिक विधियों को भी प्रयोग में लाना होगा, जिससे पढ़े-लिखे लोग मतदान के महत्व को समझ सके और अशिक्षा को दूर करके बागी मतदान को बढ़ाने में मदद मिलेगी। अतएव देश व प्रदेश के समुचित विकास, स्वस्थ व मजबूत लोकतंत्र के लिए हर मतदाताओं को मतदान करना आवश्यक है। मतदाताओं को चाहिए स्वयं भी मतदान करें औरों को भी प्रेरित करें तभी मजबूत लोकतंत्र का सपना साकार हो सकेगा।।
आलेख: © डॉ. राकेश वशिष्ठ वरिष्ठ पत्रकार एवं संपादकीय लेखक

