ACP/MACP की प्रक्रिया का किया जाये सरलींकरण
जयपुर।
संघ के जयपुर जिलाध्यक्ष कैलाश सैन ने बताया की विभाग के द्वारा व्याख्याता,प्रधानाचार्य के एसीपी व एमएसपी प्रकरण ऑनलाइन फॉर्म भरकर स्वीकृत किए जाने की प्रक्रिया विभाग में पिछले दिनों से संपादित की जा रही है। इस प्रक्रिया में कुछ कठिनाइयां तथा कुछ अव्यावहारिक बाधाएं हैं जिन्हें समाप्त किया जाना आवश्यक है ।
इनके समाप्त करने से इस व्यवस्था में सरलीकरण आने का काम होगा तथा कार्य त्वरित गति से होने से शिक्षक वर्ग को समय पर एसीपी / एमएसपी का लाभ मिल पाएगा ।
संगठन आपका ध्यान निम्न बिंदुओं की ओर आकृष्ट करना चाहता है:-
1-एसीपी/एमएसीपी का जब ऑनलाइन आवेदन शिक्षक द्वारा किया जाता है उसके पश्चात उसके आहरण वितरण अधिकारी द्वारा (जहां पर कि उस शिक्षक का सेवा रिकॉर्ड रहता है) उक्त फॉर्म में शिक्षक द्वारा दी गई जानकारी को सेवा रिकॉर्ड से मिलान कर सत्यापित करता है तथा प्रकरण को उच्च अधिकारी को अग्रेषित (फॉरवर्ड) करता है। ऐसे में यह तथ्य गौर करने लायक है कि शिक्षक द्वारा भरी गई जानकारी को उपलब्ध सेवा रिकॉर्ड के अनुसार आहरण वितरण अधिकारी द्वारा नियमानुसार जांच लिया जाता है तत्पश्चात अग्रेषित(फॉरवर्ड) किया जाता है,तो जब आहरण वितरण अधिकारी द्वारा जिस कार्यालय में सेवा रिकॉर्ड उपलब्ध है उस सेवा रिकॉर्ड से उक्त समस्त जानकारी जो फॉर्म में भरी गई का मिलान कर लेता है संतुष्ट हो जाता है तत्पश्चात आगे अग्रेषित (फॉरवर्ड)करता है उसके उपरांत भी सम्बंधित एसीपी / एमएसपी स्वीकृत करने वाले अधिकारी के कार्यालय द्वारा उसमें कमियां निकाली जाती हैं जिससे अनावश्यक प्रकरण में देरी होती है।
संगठन का मत है कि जब उक्त सभी तथ्यों को आहरण वितरण अधिकारी द्वारा उपलब्ध सेवा रिकॉर्ड (हार्ड कॉपी) से मिलान कर लिया गया है तत्पश्चात उसमें किसी प्रकार की कमी आगे के स्तर पर निकाला जाना उचित नहीं है ।कई बार ऐसी कमियां भी निकल जाती है की अपलोड किए गए आदेश की प्रति साफ नहीं है, प्रथम कार्यग्रहण रिपोर्ट जो कि लगभग 27-28 साल पुरानी है उसकी प्रति साफ नहीं है, स्थाईकरण आदेश स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा है आदि आदि ।
यह सारी बातें आहरण वितरण अधिकारी द्वारा उनके कार्यालय में उपलब्ध रिकॉर्ड को जाचने के पश्चात ही प्रकरण को अग्रेषित(फॉरवर्ड) किया गया है ऐसे में इस प्रकार से कमियां निकालना उस आहरण वितरण अधिकारी के कार्य पर भी प्रश्न चिन्ह लगाता है जिन्होंने उस प्रकरण को अग्रेषित(फारवर्ड) किया है।
क्या यह इस बात का द्योतक नहीं कि अगर आगे से किसी प्रकार की कमी निकाली गई है तो इसका तात्पर्य है की आहरण वितरण अधिकारी के कार्यालय द्वारा सही प्रकार से कार्य नहीं किया गया या तथ्यों की जांच नहीं की गई तो ऐसे में एसीपी / एमएसीपी प्रकरण विलंब से स्वीकृत होने की पीड़ा सिर्फ शिक्षक को ही क्यों मिले, उस आहरण वितरण अधिकारी के विरुद्ध भी उच्च अधिकारी द्वारा कार्रवाई प्रस्तावित होनी चाहिए कि उन्होंने बिना सही तथ्यों के जांच के प्रकरण को आगे अग्रेषित किया।
संगठन आपसे निवेदन करता है कि जब आहरण वितरण अधिकारी द्वारा तथ्यों को जांच कर प्रकरण अग्रेषित (फॉरवर्ड) किया गया है तो आहरण वितरण अधिकारी के प्रमाण पत्र के आधार पर ही एसीपी एमएसीपी स्वीकृत किया जाए ।
2-एसीपी / एमएसीपी प्रकरणों में एक बड़ा विषय ACR (वार्षिक कार्य मूल्यांकन) का भी सामने आता है जिसमें पिछले वर्षों के ACR ना होने के कारण एसीपी/एमएसीपी प्रकरण को स्वीकृत नहीं कर आक्षेप लगा लौटा दिया जाता है।
संगठन आपका ध्यान इस ओर आकृष्ट करना चाहता है कि एसीपी/एमएसीपी का ACR से कोई सीधा संबंध प्रतीत नहीं होता।
ACR अगर किसी प्रकार की प्रतिकूल टिप्पणी है तो आहरण वितरण अधिकारी उसके प्रकरण को अग्रेषित ही नही करेगा या पूर्व के किसी प्रकरण में किसी प्रकार की जांच लंबित रहने या दंडित किया हो तो एसीपी एमएसीपी स्वीकृत करने से पूर्व उस कार्यालय में उस व्यक्ति के प्रकरण की जांच शाखा द्वारा टिप्पणी ली जाती है,ऐसे में अगर किसी के विरुद्ध किसी प्रकार की जांच या दंड दिया हुआ होता है तो संबंधित कार्यालय की जांच शाखा उसको परिलक्षित कर देती है।
ऐसे में ACR का कोई कार्य नहीं रह जाता। इसके उपरांत संगठन आपका ध्यान इस ओर भी आकर्षित करना चाहता है कि प्रतिवर्ष अनिवार्य रूप से ACR प्रत्येक शिक्षक से भरवाई जाती है तो फिर यह ACR कहां जाती है ? क्यों कर यह कार्यालय में उपलब्ध नहीं हो पाती, क्यों कर शिक्षक से एसीपी या एमएसीपी या पदोन्नति के समय एससीआर वापस मांगी जाती है ?
क्या इसे हेतू संबंधित कार्यालय जवाबदेह नहीं है।
संघठन आपसे निवेदन करता है कि एसीपी / एमएसीपी प्रकरण में ACR की बाध्यता को समाप्त किया जाए जिससे अनावश्यक इन प्रकरणों में विलंब ना हो और समय पर प्रकरण निस्तारित हो सके।
ऑनलाइन व्यवस्था शुरू करने के पीछे सबसे बड़ा जो तर्क दिया गया था वह अनावश्यक लगने वाले समय में कमी करना,पारदर्शिता लाना,लाल फीता शाही को रोकना और किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार को बढ़ावा ना देना था परंतु इस व्यवस्था में उक्त बातों को हटाए बिना यह पुनीत उद्देश्य पूरा होता नजर नहीं आ रहा है ।
संगठन आपसे निवेदन करता है कि संगठन के उक्त सुझावों पर गौर कर एसीपी/एमएसीपी प्रकरण का सरलीकरण किया जाए।
सादर ।
