(स्पेशल रिपोर्ट:अमित कुमार चेचानी, चित्तौड़गढ़)
श्री सांवलिया सेठ के भक्त मानते हैं कि जब वो अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां आते हैं, तो भगवान जरूर सुनते हैं. कुछ लोग तो अपने बिजनेस में सांवलिया सेठ को “पार्टनर” बना लेते हैं और मुनाफे का हिस्सा मंदिर में अर्पित करते हैं।
सांवलिया सेठ मंदिर चित्तौड़गढ़ सॆ उदयपुर की ओर राष्ट्रीय राजमार्ग पर 28 किमी दूरी पर भादसोड़ा ग्राम में स्थित है। यह मंदिर चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन से 41 किमी एवं डबोक एयरपोर्ट से 65 किमी की दूरी पर है।
प्रसिद्ध सांवलिया सेठ मंदिर अपनी सुन्दरता और वैशिष्ट्य के कारण हर साल लाखों भक्तों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करता है। मंडफिया मंदिर कृष्ण धाम के रूप में चर्चित है। मंडफिया मंदिर देवस्थान विभाग राजस्थान सरकार के अन्तर्गत आता है। कालांतर में सांवलिया सेठ मंदिर की महिमा इतनी फैली के उनके भक्त वेतन से लेकर व्यापार तक में उन्हें अपना हिस्सेदार बनाते हैं। मान्यता है कि जो भक्त खजाने में जितना देते हैं सांवलिया सेठ उससे कई गुना ज्यादा भक्तों को वापस लौटाते हैं। व्यापार जगत में उनकी ख्याति इतनी है कि लोग अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए उन्हें अपना बिजनेस पार्टनर बनाते हैं।
कई देशों की निकलती है चढ़ावे में मुद्राएं
श्री सांवलिया जी मंदिर का भंडारा या दानपात्र माह में एक बार खोला जाता है। यह चतुर्दशी को खुलता है और इसके बाद अमावस्या का मेला शुरू होता है। होली पर यह डेढ़ माह में और दीपावली पर दो माह में खोला जाता है। सांवलिया सेठ मंदिर में कई एनआरआई भक्त भी आते हैं। ये विदेशों में अर्जित आय में से सांवलिया सेठ का हिस्सा चढ़ाते हैं। इसलिए भंडारे से डॉलर, अमरीकी डॉलर, पाउंड, दिनार, रियॉल आदि के साथ कई देशों की मुद्रा निकलती है।
1961 से हो रहा है देवझूलनी एकादशी पर विशाल मेले का आयोजन
गुजरात के विश्वप्रसिद्ध अक्षरधाम मंदिर की तर्ज पर पिछले कई बरसों से श्री सांवलिया सेठ मंदिर का नव-निर्माण जारी है। इसमें मुख्य मंदिर के दोनों ओर बरामदों में दीवारों पर बेहद आकर्षक चित्रकारी की गई है. अक्षरधाम की तरह यहां भी मंदिर के बीच खाली मैदान में संगीतमय फव्वारा लगाया जाएगा। यहां विशेषकर उत्तर-पश्चिमी भारत के राज्य जैसे मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं। 1961 से ही इस प्रसिद्ध स्थान पर देवझूलनी एकादशी पर विशाल मेले का आयोजन हो रहा है।
सांवलियाजी मंदिर परिसर एक भव्य सुंदर संरचना है जो गुलाबी बलुआ पत्थर में निर्मित है। मंदिर के गर्भगृह में सेठ सांवलिया जी की काले पत्थर की बनी मूर्ति स्थापित है जो भगवान कृष्ण के रंग को दर्शाती है. सांवलिया सेठ मंदिर की वास्तुकला प्राचीन हिंदू मंदिरों से प्रेरित है मंदिर की दीवारों और खम्भों पर सुंदर नक्काशी की गयी है जबकि, फर्श गुलाबी, शुद्ध सफेद और पीले रंग के बेदाग रंगों से बना है।
मीरा बाई के समय से है भगवान श्री सावलिया सेठ का संबंध
ऐसी मान्यता है कि भगवान श्री सावलिया सेठ का संबंध मीरा बाई से है। किवदंतियों के अनुसार सांवलिया सेठ मीरा बाई के वही गिरधर गोपाल है, जिनकी वह पूजा किया करती थी। तत्कालीन समय में संत-महात्माओं की जमात में मीरा बाई इन मूर्तियों के साथ भ्रमणशील रहती थी। दयाराम नामक संत की ऐसी ही एक जमात थी जिनके पास ये मूर्तियां थी। बताया जाता है की जब औरंगजेब की सेना मंदिरों में तोड़-फोड़ कर रही थी तब मेवाड़ में पहुंचने पर मुगल सैनिकों को इन मूर्तियों के बारे में पता लगा। मुगलों के हाथ लगने से पहले ही संत दयाराम ने प्रभु-प्रेरणा से इन मूर्तियों को बागुंड-भादसौड़ा की छापर में एक वट-वृक्ष के नीचे गड्ढा खोदकर पधरा दिया। किवदंतियों के अनुसार कालान्तर में सन 1840 में मंडफिया ग्राम निवासी भोलाराम गुर्जर नामक ग्वाले को सपना आया की भादसोड़ा-बागूंड गांव की सीमा के छापर में भगवान की 4 मूर्तियां भूमि में दबी हुई हैं। सपने के बाद भूमि की उस जगह पर खुदाई की गई तो सभी को आश्चर्य हुआ। वहां से एक जैसी 4 मूर्तियां निकली। देखते ही देखते ये खबर सब तरफ फैल गयी और आस-पास के लोग प्राकट्यस्थल पर एकत्रित होने लगे। फिर सर्वसम्मति से 4 में से सबसे बड़ी मूर्ति को भादसोड़ा ग्राम ले जाई गई, भादसोड़ा में प्रसिद्ध गृहस्थ संत पुराजी भगत रहते थे। उनके निर्देशन में उदयपुर मेवाड़ राज-परिवार के भींडर ठिकाने की ओर से सांवलिया जी का मंदिर बनवाया गया। यह मंदिर सबसे पुराना मंदिर है इसलिए यह सांवलिया सेठ प्राचीन मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंझली मूर्ति को वहीं खुदाई की जगह स्थापित किया गया इसे प्राकट्य स्थल मंदिर भी कहा जाता है। सबसे छोटी मूर्ति भोलाराम गुर्जर द्वारा मंडफिया ग्राम ले जाई गई जिसे उन्होंने अपने घर के परिण्डे में स्थापित करके पूजा आरंभ कर दी। चौथी मूर्ति निकालते समय खण्डित हो गई जिसे वापस उसी जगह पधरा दिया गया।
सांवलिया सेठ मंदिर में चढ़ावे ने रचा इतिहास
मंदिर को मिला 204 किलो चांदी और 1 किलो सोने का चढ़ावा और 28 करोड़ रुपए से अधिक का मिला नकद दान
चित्तौड़गढ़। चित्तौड़गढ़ के प्रसिद्ध सांवलिया सेठ मंदिर में इस बार जुलाई महीने का चढ़ावा अब तक का सबसे बड़ा साबित हुआ है। मंदिर में भक्तों की श्रद्धा ने नया रिकॉर्ड बना दिया है। इस बार मंदिर को कुल 204 किलो 500 ग्राम चांदी और 1 किलो 443 ग्राम सोना चढ़ावे में मिला है, जो पहले की तुलना में कहीं ज्यादा है। वहीं नकद चढ़ावे में भी इस बार मंदिर को कुल 28 करोड़ 32 लाख 45 हजार 555 रुपए की भारी राशि प्राप्त हुई है।
मंदिर मंडल के सदस्य पवन तिवाड़ी ने बताया कि इस बार चढ़ावे में सिर्फ दानपात्र ही नहीं, बल्कि ऑनलाइन माध्यम और मंदिर के भेंट कक्ष में आई राशि को भी जोड़ा गया है। सिर्फ ऑनलाइन और भेंट कक्ष से ही कुल 6 करोड़ 9 लाख 69 हजार 478 रुपए प्राप्त हुए हैं. इस बार सोना और चांदी की भी भरमार रही।
सांवलिया सेठ मंदिर को मिला रिकॉर्ड चढ़ावा
मंदिर के दानपात्र (भंडार) से 410 ग्राम सोना और 80 किलो 500 ग्राम चांदी निकली। वहीं भेंट कक्ष से 1 किलो 33 ग्राम सोना और 124 किलो चांदी मिली। इस तरह कुल मिलाकर 1 किलो 443 ग्राम सोना और 204 किलो 500 ग्राम चांदी का चढ़ावा हुआ. गौरतलब है कि इससे पहले दीपावली के बाद, 30 नवंबर 2024 को दो महीने का भंडार खोला गया था, तब कुल 187 किलो 9 ग्राम चांदी मिली थी। लेकिन इस बार श्रद्धालुओं की संख्या और आस्था दोनों ने नया कीर्तिमान रचा। दान की गिनती इस बार कुल छह राउंड में पूरी की गई।
छह राउंड तक चली गिनती, नोट गिनने में लगे 100 से ज्यादा लोग
हर महीने की तरह इस बार भी कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी, यानी 23 जुलाई को राजभोग आरती के बाद मंदिर प्रशासन ने भंडार खोला। गिनती का काम सुरक्षा के घेरे में हुआ- सीसीटीवी कैमरे, मैनुअल निगरानी और 100 से ज्यादा स्टाफ ने इस प्रक्रिया को पूर्ण किया। बीच में अमावस्या पर मेला, शनिवार और रविवार की छुट्टियों की वजह से गिनती रुकी भी, लेकिन अंत में सारी रकम 6 चरणों में गिनी गई। पहले राउंड में ही 7 करोड़ 15 लाख रुपए नकद गिने गए। दूसरे राउंड में 3 करोड़ 35 लाख और तीसरे राउंड में 7 करोड़ 63 लाख 25 हजार रुपए की नकदी गिनी गई। चौथे राउंड में 3 करोड़, पांचवें में 88 लाख 65 हजार 200 और छठे व अंतिम राउंड में 20 लाख 85 हजार 877 रुपए की नकद राशि गिनी गई। हर साल बढ़ता श्रद्धालुओं का विश्वास साफ दिखा रहा है कि सांवलिया सेठ में लोगों की आस्था कितनी गहरी है। मंदिर प्रशासन के अनुसार दान की राशि और सामग्री का सदुपयोग मंदिर के विकास कार्यों और जरूरतमंदों की सहायता के लिए किया जाएगा।
