अर्बुद पौराणिक मार्कंडेश्वरधाम में हजारो जलीय जीवों पर जिम्मेदार मौन,जलदाय विभाग द्वारा पानी दोहन करने से अस्थि विसर्जन का पवित्र कुंड
सुखने लगा,
किशन माली/पिण्डवाडा । पिण्डवाडा उपखण्ड मुख्यालय से 7 किलोमीटर दूर अजारी गांव के पास अर्बुद पौराणिक मार्कंडेश्वरधाम स्थित गुप्त गंगा नदी मे रविवार को हजारो की तादात में मछलियों की मौत हो गई, सुबह पुजा करने करने आये पुजारी व श्रृदालुओं ने हजारो की तादात में मृत
मछलियों को देखकर गहरी वेदना प्रकट की, स्थानीय प्रशासन को सुचना देने के लिए कॉल लगाई लेकिन कॉल रिसीव ही नही की गई।जानकारी के अनुसार अजारी स्थित श्री मारकुंडेश्वरजी महादेव मंदिर जो 7वी सदी का है और माँ सरस्वती का मंदिर गुप्त कालीन एक ऐसा ही मंदिर है, काफी दूर-दूर से श्रद्धालु यहां आते हैं और धाम के दर्शन करते हैं। सबसे बड़ी बात कि यहां कई महान विद्वानों ने तपस्या भी की है। गुप्तकाल में निर्मित यह मंदिर कई सदियों से बुद्धि और ज्ञान का बल चाहने वालों के लिए आस्था का केंद्र रहा है। साथ ही प्रदेश में इस मंदिर का एक खास पहचान है। पिण्डवाडा से आबूरोड हाईवे मार्ग पर अजारी चौराहे से 5 किलोमीटर भीतर अजारी गाव के
समीप दूर पर्वतीय नाले के पार वन क्षेत्र से घिरा हुआ सुंदर अर्बुद पौराणिक धाम मारकुंडेश्वरजी महादेव का 7 वी सदी का प्राचीन मंदिर है,प्राक्रतिक छठा व हरे भरे पेड पौधो व खजूर के वृक्षों से घिरा यह मंदिर अपने आप में अनूठा है । मंदिर के सामने ही पञ्चतत्व जल बहता है, कहते है इस जल में बाण गंगा, सूर्य कुंड, गया कुंड आदि का भी जल एकत्र होता है । यह जल कभी नही सूखता था, दंत कथा है की इसी गाव के एक भक्त की गंगा के प्रति असीम श्रृद्वा के
कारण ही गंगा स्वयं इस गाव में आई थी, अत: इस पानी को गंगाजल ही माना जाता है।

मोक्ष प्राप्ति के लिए अस्तिया विसर्जन व पितृ पुजन की कर्मस्थली है धाम-
यहा प्रवाहित गंगा में सिरोही जिले सहित दुर दराज से लोग मोक्ष प्राप्ति के लिए इसी कुंड में अस्थि प्रवाहित करते है साथ ही अकाल मृत्यु के दरम्यान हिन्दु संस्कृति की
मान्यताओं अनुसार पितृ शान्ति सहित विविध अनुष्ठान सम्पन्न करवाए जाते है।
बाल ऋषि मार्कण्डेय सहित कई विद्वानों की तपस्या स्थली रही-
माँ सरस्वती की प्रतिमा अति प्राचीन है जो गुप्तकालीन सुंदर काले पत्थर की चमत्कारिक प्रतिमा है,लगभग 4 फुट ऊँचे आकार की माँ सरस्वती की ऐसी सुंदर प्रतिमा देशभर में शायद ही कही होगी । दंतकथा अनुसार बालमहर्षि मार्कंडेय की भी यह तपो भूमि रही है । बताया जाता है बालमहर्षि मार्कंडेय की मृत्यु बारह वर्ष की उम्र में होनी
निश्चित थी तब मार्कंडेय ने यम से बचने के लिए महामृत्युंजय का जाप व कठोर शिव की तपस्या के बल पर मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी, मार्कंडेय अमरत्व प्राप्त
होने से इस स्थल को मारकुंडेश्वरजी भी कहते है, यहाँ पर आज भी वो धुनी मौजूद है। तथा इसी तपोस्थली पर महाकवि कालिदास ने भी ज्ञान प्राप्त किया था। वही यहा
पर राजा कुमारपाल सोलंकी के गुरु हेमचंद्राचार्य एवं जगद्गुरु शांतिविजयजी ने पञ्च वर्षो तक माँ सरस्वती की साधना कर अथाह ज्ञान प्राप्त किया था । मंदिर से
जुड़ी प्राचीन मान्यताओं और मां सरस्वती के इस खास दर्शनीय स्थल पर हजारों की संख्या में भक्त जुटते हैं और देवी की पूजा-अराधना करते हैं।जलदाय विभाग द्वारा अवैघ रूप से पानी दोहन करने से सुखने लगी गंगा-करीब डेढ दशक पुर्व क्षैत्र में अकाल के दरम्यान अस्थायी विकल्प के रूप से गंगा के पास कुण्ड से अजारी गांव हेतू पेयजल व्यवस्था शुरू की गई थी।लेकिन विभाग की लापरवाही कहे अथवा मनमानी तब से लगातार इस कुण्ड से अजारी गांव हेतू पानी का दोहन किया जाने लगा जिससे कभी न सुखने वाली गंगा में हर वर्ष पानी की कमी होने के साथ साथ मछलियो के मौत का सिलसिला भी शुरू हो गया है।
समाप्त हो रही पवित्र गंगा कुंड की रौनक-
डेढ दशक पहले मछलियों से इस पवित्र कुण्ड की भव्यता देखते ही बनती थी। सैकड़ों लोग दाना खिलाने पहुंचते थे। तब रौनक नजर आती थी। लोग मछलियों को दाना खिलाकर पुण्य कमाते थे। अब मछलियां नहीं होने से रौनक खत्म हो गई है। इस पवित्र तीर्थ में साफ-सफाई व जल निकासी की उचित व्यवस्था न होने के कारण् तीर्थ का जल दूषित और जहरीला हो गया है। गंगा कुण्ड का गंदा पानी होने से प्रदूषण् का स्तर बढ़ जाता है, जिससे मछलियां
पानी में सांस नहीं ले पाती हैं। जिस कार ण से भी प्रत्येक वर्ष इस जल के अंदर रहने वाली लाखों मछलियों की मौत हो जाती है।
स्थानीय प्रशासन की रही है अनदेखी –
वेसे तो इस पवित्र तीर्थ को तत्कालीन मुख्यमंत्री भेरोसिंह शेखावत ने तीर्थ क्षैत्र घोषित कर विकास की घोषणा
भी की गई थी लेकिन करीब ढाई दशकों से यह घोषणा अस्तित्व में नही आ सकी है। पुर्व में वर्ष प्रयन्त गतिमान रहने वाला गंगाजल पानी दोहन के कारण् सुख गया अब मछलियों के जीवन बचाने के लिए मंहत रेवानाथजी व
श्रृदालुओ द्वारा गंगा कुण्ड में टेकरो से पानी डाला जाता है। कभी यहा आने वाले श्रृदालु पवित्र जल का आचमन लेते थे लेकिन कुण्ड में वर्षभर लगातार अस्थिया प्रवाहित करने एवं पानी की कमी से गंदगी से सना हुआ होने से लोग हाथ डालने से भी गुरेज करने लगे है।
श्रृदालुओ की अगाघ आस्था व जलीय जीवों को बचाने का सार्थक प्रयास हो-
जलदाय विभाग द्वारा कुण्ड के पानी का दोहन रोककर अन्यत्र व्यवस्था करवाई जाए। प्रशासन द्वारा आस्था के सम्मान हेतू गंगा कुण्ड व गया कुण्ड की साफ-सफाई की जाए। मछलियों की मौत रोकने हेतू जिम्मेदार विभाग द्वारा ऑक्सीजन की आपूर्ति करने के लिए कृत्रिम ऑक्सीफ्लोर व ऑक्सीडस्ट का छिड़काव बराबर कराया जाए। समय-समय पर तीर्थ में एकत्रित पानी की रिचार्जिंग कराई जाए।
