परिग्रह नहीं, त्याग और सदाचार से प्रशस्त होता है आत्मकल्याण का मार्ग
चोरी केवल वस्तु चुराना नहीं, किसी को मानसिक संताप देना भी है : गणधर मुनि विवर्धन सागर
कोटा। कुन्हाड़ी स्थित ऋद्धि-सिद्धि नगर के श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन जिनालय में विराग वर्धन पावन वर्षायोग-2026 के अंतर्गत बुधवार को आयोजित धर्मसभा में गणधर मुनि श्री 108 विवर्धन सागर महाराज ने चोरी के स्वरूप, उसके नैतिक दुष्परिणाम और सदाचार के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी की वस्तु चुराना केवल संपत्ति का हरण नहीं, बल्कि उसके मन को संताप पहुंचाना भी है। मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति ईमानदारी और पुरुषार्थ से करनी चाहिए।
मुनि ने कहा कि धन-संपत्ति का अनावश्यक संग्रह जीवन का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। मनुष्य जीवनभर धन जुटाता है, लेकिन अंततः वह यहीं रह जाता है। संत बनारसीदास के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने संग्रह की प्रवृत्ति पर चिंतन करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि धन का सदुपयोग दान और भोग में है। जरूरतमंदों की सहायता, ज्ञान का प्रसार और धर्म की प्रभावना के लिए संसाधनों का उपयोग करना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वस्तुओं की माप में कमी करना, खाद्य सामग्री में मिलावट करना और अनुचित तरीके से किसी को कम वस्तु देना भी चोरी के ही रूप हैं। चोरी को प्रोत्साहित करना अथवा गलत कार्य करने वाले का विरोध नहीं करना भी अनुचित प्रवृत्ति को बढ़ावा देता है। उन्होंने एक प्रसंग के माध्यम से समझाया कि बच्चों की गलतियों को समय रहते रोकना और उन्हें सही संस्कार देना आवश्यक है। समय पर किया गया मार्गदर्शन व्यक्ति को गलत रास्ते पर जाने से बचा सकता है।
मुनि ने कहा कि मनुष्य को विपरीत परिस्थितियों में भी अपने परिणामों को खराब नहीं करना चाहिए। धन की हानि होने पर दुखी होने के बजाय धैर्य और विवेक बनाए रखना चाहिए। जीवन में सत्य, ईमानदारी और संयम को अपनाकर ही आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।
धर्मसभा में चित्र अनावरण और दीप प्रज्ज्वलन ,मुनि के पाद प्रक्षालन मंदिर समिति के सदस्यो ने किए। सभा का संचालन पारस कासलीवाल ने किया।
जिनालय समिति के अध्यक्ष राजेंद्र गोधा एवं मंत्री पंकज खटोड़ ने बताया कि धर्मसभा में रमेश हरसोरा, अशोक पांडिया, पदम हरसोरा, टीकम पाटनी, अनिल मित्तल, पारस लुहाड़िया, संदीप बंसल, नितेश खटोड़ और प्रदीप पापड़ीवाल सहित समाज के अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।
